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एक शब्द में पूरा संसार है पिता

पिता

पारस प्रकाश सारस्वत


एक शब्द में पूरा संसार है पिता
मां अगर नाव है तो पतवार है पिता
जो मुसीबत में तुम्हारे आगे खड़ा हो
और कामयाबी में तुम्हारे पीछे
कुछ इस तरह के किरदार है पिता।
लेकिन, अचानक उस पिता का चले जाना
ऐसा है जैसे,
बसंत के मौसम में पतझड़ का आ जाना,
जैसे,
मुठ्ठी में से रेत का एक दम से निकाल जाना,
जैसे,
कोई जलता हुआ चिराग अब जलना भूल गया हो,
जैसे,
घुटने के बल चलते – चलते बच्चा चलना भूल गया हो,
जैसे,
होली,दीवाली सब तीज – त्योहार वीरान हो गए हों,
जैसे,
अब सब चाचा ताऊ भी अनजान हो गए हों,
जैसे,
ज़िन्दगी में सांसे तो हों, मगर जीने का आधार ना हो,
जैसे,
कोई रोते हुए को गले लगाए, लेकिन उसमें प्यार ना हो,
जैसे,
सारा संसार तुम्हारा होके भी, तुम्हारा ना रहे,
जैसे,
अपने ही घर का आंगन अब, हमारा ना रहे,
कुछ इस क़दर हालत हो जातें हैं,
जब पिता अचानक साथ छोड़ जाते हैं,
जब मां टूट चुके मकान को घर में ढालती है,
पूरे दिन काम करती है, मेहनत करती है,
और हम भाई – बहनों को पालती है,
जब हमारे घर की लक्ष्मी किसी और की जूठन धोती है,
जब वो आधी रात जाग कर, पिता जी की याद में रोती है,
वो पता नहीं लगने देती अपनी एक बीमारी भी,
दिन – रात मेहनत कर वो, पूरा परिवार चलाती है,
ग़म चाहे बेशुमार मिलते हों उसे, मगर
वो हर शाम जब भी आती है तो बेहद मुस्कुराती है,
पिता का जाना सिर्फ हम बच्चों को दुख नहीं देता,
ये हमारी मां का भी जीवन उजाड़ देता है,
वो रंगो को छोड़ , सफेदी अपना लेती है,
अब कोई उसे सुहागन का आशीर्वाद नहीं देता है,
ये ऐसा दर्द है, जो सारी हदों को पार कर जाता है,
इसके आने के बाद, घर में कोई रिश्तेदार भी नहीं आता है,
लेकिन,
कहते हैं वो पिता है, हमेशा साथ हैं, वो कहां जाते हैं,
जब कोई सिर पर हाथ फेर कर बेटा कहता है,
मै उनको देखता हूं,और मुझे अपने पिता याद आते हैं।

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